पचपदरा रिफाइनरी : विकास की कीमत कौन चुका रहा है?

राजस्थान के बाड़मेर जिले के पचपदरा में स्थापित ग्रीनफील्ड रिफाइनरी एवं पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स का उद्घाटन केवल एक औद्योगिक परियोजना का उद्घाटन नहीं है। यह भारतीय ऊर्जा क्षेत्र, सार्वजनिक निवेश, संघीय वित्तीय संबंधों, प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और विकास की अवधारणा से जुड़े अनेक प्रश्नों को एक साथ सामने लाता है।

उद्घाटन के अवसर पर इसे राजस्थान के इतिहास का स्वर्णिम क्षण, राज्य को मिली बड़ी सौगात और विकास के नए युग की शुरुआत बताया गया। किंतु लोकतांत्रिक समाज में सार्वजनिक परियोजनाओं का मूल्यांकन उत्सवधर्मिता से नहीं, बल्कि तथ्यों और परिणामों के आधार पर होना चाहिए।

सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि यह किसी सरकार की निजी उपलब्धि या किसी प्रदेश को दिया गया उपहार नहीं है। यह सार्वजनिक क्षेत्र की परियोजना है, जिसे जनता के धन, सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों और प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर विकसित किया गया है। इसलिए इस परियोजना का वास्तविक स्वामी भारतीय नागरिक है और उसे यह पूछने का पूरा अधिकार है कि इस निवेश से देश और विशेष रूप से राजस्थान को क्या प्राप्त होगा तथा इसके बदले क्या कीमत चुकानी पड़ेगी।

भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है और अपनी आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से आधुनिक रिफाइनिंग क्षमता का विस्तार आवश्यक है। पचपदरा परियोजना इस आवश्यकता की पूर्ति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसकी नौ मिलियन मीट्रिक टन वार्षिक क्षमता, 17 का नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स तथा बीएस-6 मानक के ईंधन और उच्च मूल्य वाले पेट्रो-रसायनों के उत्पादन की क्षमता इसे विश्वस्तरीय परियोजनाओं की श्रेणी में खड़ा करती है।

यह भारत को विभिन्न प्रकार के भारी और हल्के कच्चे तेल के शोधन की सुविधा देती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में खरीद की रणनीति अधिक लचीली बन सकती है।

इस परियोजना की एक विशेषता यह भी है कि यह केवल पारंपरिक रिफाइनरी नहीं है। इसमें पेट्रोल और डीजल के साथ-साथ पॉलीप्रोपाइलीन तथा पॉलीइथिलीन जैसे पेट्रोकेमिकल उत्पाद भी तैयार होंगे, जिनका उपयोग प्लास्टिक, पैकेजिंग, चिकित्सा उपकरणों, वस्त्र उद्योग और अनेक विनिर्माण क्षेत्रों में होता है। ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में केवल ईंधन की तुलना में पेट्रोकेमिकल उत्पाद अधिक लाभकारी सिद्ध होंगे। इस दृष्टि से परियोजना तकनीकी रूप से दूरदर्शी दिखाई देती है।

लेकिन यहीं से प्रश्नों का दूसरा अध्याय शुरू होता है।

राजस्थान में रिफाइनरी की मांग तब उठी थी जब बाड़मेर क्षेत्र में तेल के भंडार मिले थे। उस समय तर्क था कि राजस्थान से निकलने वाले तेल का शोधन भी राजस्थान में ही होना चाहिए ताकि राज्य को औद्योगिक विकास का लाभ मिल सके। परंतु समय के साथ परियोजना का स्वरूप पूरी तरह बदल गया।

अब कुल क्षमता का केवल लगभग सोलह-सत्रह प्रतिशत कच्चा तेल ही राजस्थान के मंगला क्षेत्र से आएगा, जबकि लगभग तिरासी प्रतिशत तेल विदेशों से आयात किया जाएगा। अर्थात यह परियोजना अब राजस्थान के तेल की रिफाइनरी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय ऊर्जा अवसंरचना का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।

यदि परियोजना का चरित्र राष्ट्रीय है तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि उसकी आर्थिक और प्राकृतिक लागत का बड़ा भाग राजस्थान क्यों वहन करे?

परियोजना की लागत इस प्रश्न को और गंभीर बना देती है। प्रारंभिक अनुमान लगभग 43 हजार करोड़ रुपये का था, जो बढ़ते-बढ़ते लगभग 79 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया। लागत बढ़ने के साथ राजस्थान सरकार की इक्विटी भागीदारी भी लगभग दोगुनी हो गई। इसके अतिरिक्त राज्य ने वर्षों तक ब्याजमुक्त सहायता उपलब्ध कराने और अन्य वित्तीय दायित्व भी स्वीकार किए। परियोजना का ऋण-इक्विटी अनुपात भी काफी ऊंचा है।

इसका अर्थ है कि प्रारंभिक वर्षों में यदि अनुमानित उत्पादन और लाभ प्राप्त नहीं हुआ तो अतिरिक्त पूंजी की आवश्यकता उत्पन्न हो सकती है।

सार्वजनिक क्षेत्र की परियोजनाओं में लाभ केवल बैलेंस शीट से नहीं मापा जाता। रोजगार, औद्योगिक विकास और आधारभूत संरचना भी उसके लाभ हैं। किंतु यदि वित्तीय जोखिम लगातार बढ़ता जाए तो अंततः उसका बोझ भी सार्वजनिक धन पर ही आता है। इसलिए इस परियोजना की दीर्घकालिक आर्थिक व्यवहार्यता पर गंभीर निगरानी आवश्यक होगी।

वित्तीय प्रश्नों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों का प्रश्न है।

पचपदरा का क्षेत्र निर्जन मरुभूमि नहीं था। यहां गांव थे, कृषि भूमि थी, नमक उत्पादन की पारंपरिक व्यवस्था थी और स्थानीय अर्थव्यवस्था का अपना स्वरूप था। हजारों एकड़ भूमि के साथ बड़ी संख्या में नमक उत्पादन की लीजें समाप्त हुईं। भूमि का मुआवजा दिया जा सकता है, किंतु स्थानीय सामाजिक संरचना, पारंपरिक व्यवसाय और सांस्कृतिक भूगोल का मूल्य केवल धनराशि में नहीं आंका जा सकता।

सबसे बड़ी चिंता पानी को लेकर है।

पश्चिमी राजस्थान सदियों से जल-संकट का प्रदेश रहा है। यहां पानी केवल संसाधन नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न है। इंदिरा गांधी नहर ने इस मरुभूमि को जीवन दिया। उसी नहर से इस विशाल औद्योगिक परिसर के लिए प्रतिदिन लगभग 9.6 मिलियन लीटर पानी उपलब्ध कराया जाएगा। इसके लिए लगभग 210 किलोमीटर लंबी विशेष पाइपलाइन बिछाई गई है, जिस पर भी सार्वजनिक धन खर्च हुआ है।

यहीं विकास की सबसे कठिन नैतिक चुनौती सामने आती है।

क्या ऐसे प्रदेश में, जहां जोधपुर जैसे बड़े शहर में आज भी लोगों को कई दिनों के अंतराल पर पानी मिलता है, जहां किसान सिंचाई के लिए बारी प्रणाली पर निर्भर हैं और जहां हर वर्ष नहरबंदी के दौरान पेयजल संकट खड़ा हो जाता है, वहां उद्योग को निर्बाध जलापूर्ति सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए?

यह प्रश्न उद्योग-विरोध का नहीं, बल्कि संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण का है।

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में पश्चिमी राजस्थान का जल-संकट और गंभीर होने की आशंका है। यदि भविष्य में पानी की उपलब्धता कम होती है तो क्या उद्योग, कृषि और पेयजल के बीच संतुलन बनाए रखने की कोई दीर्घकालिक नीति तैयार की गई है? क्या इसके लिए अतिरिक्त जल-स्रोत विकसित किए जाएंगे? क्या उद्योग में प्रयुक्त जल के अधिकतम पुनर्चक्रण और पुनः उपयोग को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया जाएगा?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर अस्पष्ट हैं तो भविष्य में जल-संघर्ष की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

परियोजना का एक पर्यावरणीय पक्ष भी है। यह सही है कि आधुनिक तकनीक प्रदूषण को काफी सीमा तक नियंत्रित करती है, किंतु पेट्रोकेमिकल उद्योग अंततः जीवाश्म ईंधन आधारित अर्थव्यवस्था का ही हिस्सा हैं। दूसरी ओर विश्व ऊर्जा संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। इलेक्ट्रिक वाहनों का विस्तार, हरित ऊर्जा में निवेश और कार्बन उत्सर्जन कम करने की वैश्विक प्रतिबद्धताएं भविष्य के ऊर्जा बाजार को बदल रही हैं।

ऐसे में यह भी विचारणीय है कि आने वाले तीन-चार दशकों में इस प्रकार की परियोजनाओं की आर्थिक संरचना किस प्रकार प्रभावित होगी।

लेकिन विकास का मूल्यांकन केवल सकल निवेश, उत्पादन क्षमता या उद्घाटन समारोह से नहीं किया जा सकता। विकास तभी सार्थक है जब उसके लाभ और उसकी लागत दोनों का वितरण न्यायपूर्ण हो। यदि संसाधनों की कीमत स्थानीय समाज चुकाए और लाभ का बड़ा भाग कहीं और केंद्रित हो जाए, तो विकास की अवधारणा अधूरी रह जाती है।

किसी भी सार्वजनिक निवेश का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जाता कि उससे कितना उत्पादन होगा, बल्कि इस आधार पर भी किया जाता है कि निवेश करने वाले समाज को उसके बदले क्या प्राप्त होगा। पचपदरा रिफाइनरी के संदर्भ में यही सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

राजस्थान ने इस परियोजना के लिए भूमि उपलब्ध कराई, हजारों करोड़ रुपये की इक्विटी लगाई, वर्षों तक वित्तीय सहायता देने का दायित्व स्वीकार किया, इंदिरा गांधी नहर से जल उपलब्ध कराया, जलापूर्ति के लिए विशेष पाइपलाइन बनवाई और आवश्यक आधारभूत संरचना विकसित की। ऐसे में यह जानना स्वाभाविक है कि इन निवेशों के बदले राज्य को दीर्घकालिक आर्थिक लाभ कितना प्राप्त होगा।

रिफाइनरी से राज्य को कुछ प्रत्यक्ष लाभ अवश्य मिलेंगे। निर्माण और संचालन के दौरान रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे। परिवहन, लॉजिस्टिक्स, रखरखाव, होटल, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और छोटे-बड़े सेवा क्षेत्र का विस्तार होगा। पेट्रोकेमिकल आधारित उद्योग विकसित होने की संभावना बनेगी। यदि राज्य सरकार सुनियोजित औद्योगिक नीति अपनाती है, तो प्लास्टिक, पैकेजिंग, रसायन तथा विनिर्माण क्षेत्र में नए निवेश आकर्षित किए जा सकते हैं।

लेकिन दूसरी ओर कुछ ऐसे लाभ हैं जिनका अधिकांश हिस्सा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी को प्राप्त होगा। आयातित कच्चे तेल के शोधन से होने वाला व्यावसायिक लाभ, ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा की बचत तथा पेट्रोकेमिकल उत्पादन का राष्ट्रीय लाभ पूरे देश को मिलेगा। इसलिए यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि जिस राज्य ने सबसे अधिक प्राकृतिक और वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए, क्या उसे भी उसी अनुपात में प्रतिफल मिलेगा?

यहाँ केवल रोजगार के दावों से संतोष नहीं किया जा सकता। आवश्यक है कि राज्य सरकार समय-समय पर सार्वजनिक रूप से यह बताए कि परियोजना से राजस्थान को कितना कर-राजस्व प्राप्त हुआ, स्थानीय लोगों को कितने स्थायी रोजगार मिले, स्थानीय उद्योगों में कितना निवेश आया, कितने सूक्ष्म एवं लघु उद्योग विकसित हुए, और परियोजना से जुड़े सामाजिक उत्तरदायित्व के अंतर्गत शिक्षा, स्वास्थ्य, जल संरक्षण तथा पर्यावरण पर कितना व्यय किया गया।

इतना ही नहीं, परियोजना के कारण जिन क्षेत्रों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा—विशेषकर जल संसाधनों और पर्यावरण पर—उनकी भरपाई के लिए भी एक पृथक ‘संसाधन प्रतिपूर्ति नीति’ बनाई जानी चाहिए। यदि मरुस्थल का पानी उद्योग को दिया जा रहा है, तो समानांतर रूप से वर्षा जल संचयन, अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण, नए जल स्रोतों के विकास और स्थानीय जल संरक्षण पर अनिवार्य निवेश भी होना चाहिए।

विकास तभी न्यायपूर्ण माना जाएगा जब उससे उत्पन्न लाभ का एक हिस्सा उन समुदायों तक भी पहुँचे जिन्होंने अपने संसाधनों का सबसे बड़ा त्याग किया है।

अंततः पचपदरा रिफाइनरी की सफलता केवल उसकी उत्पादन क्षमता से नहीं मापी जाएगी। उसका वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होगा कि उसने राजस्थान को कितना समृद्ध बनाया, स्थानीय समाज को कितना सशक्त किया और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग में कितना संतुलन स्थापित किया। सार्वजनिक परियोजनाओं की सबसे बड़ी कसौटी यही है कि उनका लाभ समाज के अधिकतम वर्ग तक पहुँचे और उनकी लागत किसी एक क्षेत्र या समुदाय पर असमान रूप से न पड़े।

आज आवश्यकता इस बात की है कि राजस्थान सरकार और केंद्र सरकार इस परियोजना से जुड़े कुछ मूलभूत प्रश्नों पर स्पष्ट सार्वजनिक नीति प्रस्तुत करें।

पहला, स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता किस प्रकार सुनिश्चित की जाएगी? दूसरा, पानी की उपलब्धता पर उद्योग का प्रभाव कम करने के लिए क्या वैकल्पिक जल-प्रबंधन योजना है? तीसरा, परियोजना से होने वाले राजस्व का कितना हिस्सा स्थानीय क्षेत्र के सामाजिक और पर्यावरणीय विकास पर व्यय किया जाएगा? चौथा, यदि भविष्य में अतिरिक्त पूंजी निवेश की आवश्यकता पड़ी तो उसका भार किस पर पड़ेगा? और पाँचवाँ, क्या इस परियोजना की सामाजिक एवं पर्यावरणीय लागत का समय-समय पर स्वतंत्र मूल्यांकन कराया जाएगा?

लोकतंत्र में किसी भी सार्वजनिक परियोजना का सबसे बड़ा आधार पारदर्शिता और जवाबदेही है। यदि ये दोनों तत्व मजबूत हैं तो बड़े निवेश भी जनता का विश्वास अर्जित करते हैं। यदि ये अनुपस्थित हैं तो सबसे आधुनिक परियोजना भी विवाद का विषय बन जाती है।

पचपदरा रिफाइनरी भारत की ऊर्जा क्षमता का महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकती है। इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन उतना ही सत्य यह भी है कि इसकी सफलता का वास्तविक मापदंड केवल उत्पादन या लाभ नहीं होगा। इसकी सफलता इस बात से तय होगी कि क्या यह राजस्थान के लोगों के जीवन की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार ला सकी, क्या इसने स्थानीय संसाधनों के उपयोग में न्याय किया, और क्या इसने विकास तथा पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया।

विकास का इतिहास केवल उन परियोजनाओं को याद नहीं रखता जो सबसे बड़ी थीं; वह उन्हें भी याद रखता है जिन्होंने विकास की कीमत सबसे न्यायपूर्ण ढंग से चुकाई। पचपदरा रिफाइनरी के सामने भी यही कसौटी है। यदि यह परियोजना ऊर्जा सुरक्षा के साथ जल सुरक्षा, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और स्थानीय भागीदारी का भी मॉडल बनती है, तभी इसे सच अर्थों में ऐतिहासिक उपलब्धि कहा जा सकेगा। अन्यथा यह प्रश्न लंबे समय तक बना रहेगा—रिफाइनरी का सपना तो पूरा हुआ, मगर आखिर किस कीमत पर?

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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